
एक ध्वज को प्रतिदिन करोड़ो प्रणाम
एक दशहरे से एक शताब्दी तक संघ की यात्रा
हिंदुओ की एकता से समाज की समरसता तक संघ की परिकल्पना साकार
100 वर्ष पूर्व एक मास्टर प्लानर ने रखी संघ की बुनियाद
देश सेवा का लक्ष्य लेकर समाज का चिंतन करने वाला स्वयंसेवक देश के विकास के लिए सतत प्रयत्नशील है जिसे बनाने के लिए संघ प्रत्तेक शाखा के माध्यम से घर घर तक पहुचने का शंखनाद कर चुका है। आज समाज मे जहां लोग अपने परिवार को कुछ वर्षो तक एकत्र रख पाने के लिए संघर्ष कर रहे है वही एक ऐसे महापुरूष डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने भारत भूमि में जन्म लिया जिसने 100 वर्ष बाद की परिकल्पना कर संघ परिवार की नीवं रखी। जो एक दशहरे से शुरू होकर आज एक शताब्दी वर्ष को पूर्ण कर चुकी है।
गौरतलब है कि आरएसएस ने स्थापना के सौ साल पूरे कर लिए हैं और वह 2 अक्टूबर को अपना शताब्दी वर्ष समारोह को मनाएगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अंग्रेजी कलेंडर के लिहाज से 29 सितम्बर को 100 साल का हो गया। जबकि देशी कलेंडर (विक्रम संवत) के लिहाज से संघ विजयादशमी (दो अक्टूबर) से शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की शुरुआत करेगा। अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में हुई थी। उस दिन विजयादशमी (दशहरे) का दिन था और संघ देशी कलेंडर के आधार पर ही स्थापना दिवस मनाता है।
विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन
संघ की स्थापना दो दर्जन कार्यकर्ताओं के साथ हुई थी जो अब विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन के रूप में विस्तार कर चुकी है। संघ के द्वारा शताब्दी वर्ष के दौरान व्यापक जन संपर्क अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत देश के सभी 6 लाख 35 हजार गांवों तक पहुंचने का लक्ष्य है।
संघ की सभी शाखा में पूर्ण गणवेश

विजयादशमी और उसके एक सप्ताह बाद तक संघ की सभी शाखाओं में पूर्ण गणवेश में अधिकतम स्वयंसेवक उपस्थित होने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही नगर, मंडल स्तर पर सम्मेलन होंगे। खंड स्तर पर सामाजिक सद्भाव बैठकें की जाएंगी। प्रमुख जन गोष्ठी आयोजित होगी जिसमें सामाजिक स्तर पर सक्रिय सभी प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया जाएगा साथ ही युवा शक्ति जागरण के कार्यक्रम भी होंगे।
सौ वर्षो से युवाओ का संगठन
एक संगठन मे जहा सौ वर्ष बाद उसे बूड़ा सगंठन होने की पहचान मिलती है वही एक ऐसा संगठन है जिसे युवाओ का सगंठन होने का गौरव प्राप्त है। जहां की शाखा मे पहुच कर 90 वर्ष का वरिष्ट स्वयं सेवक भी युवाओ के साथ युवा बन जाता है। देश की अनेक शाखाओ के वरिष्ट स्वयं सेवक आज भी युवाओ से अधिक युवा नजर आते है। संघ की शाखा मे आने वाला प्रत्तेक स्वयंसेवक युवा नजर आता है। एक साधारण शाखा से प्रारंभ हुआ यह संगठन आज भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। विजयदशमी (2 अक्टूबर 2025) संघ के सौ वर्ष पूर्ण होने का ऐतिहासिक क्षण होगा। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक परिपक्व संगठन की यात्रा का प्रमाण है, जहां एक व्यक्ति के सौ वर्ष बुढ़ापे का संकेत देते हैं, वहीं एक संगठन के सौ वर्ष परिपक्वता और दृढ़ता का प्रतीक नजर आ रहे हैं।
राष्ट्र रक्षा के लिए स्वयंसेवकों का निर्माण
संघ की स्थापना के समय हिंदू समाज को संगठित कर राष्ट्र को मजबूत बनाना डॉ. हेडगेवार का उद्देश्य था। उन्होंने कहा था- हिंदू राष्ट्र की रक्षा के लिए स्वयंसेवकों का निर्माण आवश्यक है। संघ सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रीय एकता जैसे मुद्दों पर प्रयत्नशील है। जिसमें स्वयंसेवक संघ की वैचारिक यात्रा का सार है।
भगवा झंडे को गुरु का दर्जा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा झंडे को गुरु का दर्जा दिया गया है। भगवा झंडा अनादि काल से लेकर आज तक संघ की विरासत का प्रतीक है। सौ वर्षो की यात्रा मे ध्वज का विशेष महत्व है। जहा प्रतिदिन हजारो शाखाओ मे करोड़ो स्वयं सेवक ध्वज को प्रणाम कर समाज सेवा का संकल्प लेते है।
संघ का पंच परिवर्तन अभियान पर जोर
संघ ने पंच परिवर्तन अभियान पर जोर दिया है जिसमें व्यक्तिगत परिवर्तन, पारिवारिक परिवर्तन, सामाजिक परिवर्तन, पर्यावरणीय परिवर्तन और राष्ट्रीय परिवर्तन का लक्ष्य रखा गया है। संघ शाखाओं का विस्तार के साथ ही समाज के हर वर्ग को जोड़ने के अभियान मे जुट गया है। संघ की शताब्दी केवल उत्सव नहीं है इसमे समाज को एक सूत्र में बांधने का माध्यम माना जा रहा है।
संघ की चुनौतियो के सौ वर्ष
एक ऐसा संगठन जिसे किसी से कोई अपेक्षा नही है बल्कि समाज की अपेक्षाओ को पूर्ण करने के गृह त्यागी समाज सेवियो के निर्माण की ईकाई है जिसमें सौ वर्षो से करोड़ो युवाओ ने देश व समाज हितार्थ अपने हितो का त्याग किया है। त्याग तपस्या और बलिदान के अनेको उदाहरणो के समेटे इस संगठन की नीव लोकहित मे रखी गई है यही कारण है कि जहा देश की तमाम राजनैतिक पार्टियां खंड खंड हुई लेकिन स्वयं सेवियो का संगठन आज भी अखंड परिकल्पनाओ को साकार कर रहा है। संघ की चुनौतियो के सौ वर्ष का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह संघ की यात्रा का आकलन करने का अवसर प्रदान करता है। 1925 से 2025 तक, संघ ने असंख्य चुनौतियों का सामना किया-विभाजन की विभीषिका, आपातकाल का अंधेरा, प्राकृतिक आपदाओं का संकट फिर भी, यह संगठन अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ता गया।
एक से एक लाख शाखा का लक्ष्य

एक शाखा से एक लाख शाखा का लक्ष्य लेकर संघ घर घर तक पहुचने की तैयारी कर चुका है। वर्तमान मे संघ की 68,000 से अधिक शाखाएं हैं, जिसमें पथ संचलन की तैयारियां जोरों पर हैं। स्वयंसेवक की तैयारियां इन दिनो समाज में कौतूहल का विषय बना है। संघ में स्वयंसेवकों को दिशा देने का कार्य किया जाता है जहां उन्हे आत्मनिर्भर भारत और सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर बल दिया जा रहा है।
अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक
संघ ने 1,500 से 1,600 हिंदू सम्मेलनों का आयोजन कर हर क्षेत्र में सांस्कृतिक केंद्र विकसित करने का प्रयास किया है जिसमें संत, विद्वान, युवा, महिलाएं और कारीगर शामिल है। ‘सामाजिक समरसता’ अभियान के तहत एक लाख हिंदू सम्मेलन और घर-घर संपर्क अभियान का लक्ष्य रखा गया है जो विभिन्न हिंदू समुदायों को जोड़ने का प्रयास करेगा। शताब्दी की वैचारिक यात्रा को मजबूत करने के लिए उत्सव नहीं, बल्कि संघ के मूल्यों-अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभक्ति-को पुनः प्रतिपादित करने का माध्यम बनाया जा रहा हैं।
सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध संघ
द्वितीय सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी) ने 1956 में हिंदू समाज की एकता पर जोर दिया। वे कहते हैं- हिंदू राष्ट्र की अवधारणा जाति-भेद से ऊपर उठकर समग्र समाज को मजबूत बनाती है। उनके समय में संघ ने विभाजन के घावों को भरने का कार्य किया। तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने 1973 के बाद के उद्बोधनों में सामाजिक समानता को संघ का मुख्य लक्ष्य बताया। वे आरक्षण और दलित उत्थान पर कहते हैं- “संघ जातिवाद का विरोधी है, लेकिन सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध।
शारीरिक और वैचारिक शक्ति का प्रदर्शन
संघ के शताब्दी वर्ष में पथ संचलन का विशेष महत्व है। यह संघ की शारीरिक और वैचारिक शक्ति का प्रदर्शन है। नागपुर का पथ संचलन 5,000 से बढ़कर 10,000 स्वयंसेवकों का होगा, जो अनुशासन और एकता का संदेश देगा। अयोध्या में राम पथ पर मार्च राम जन्मभूमि के प्रति संघ की निष्ठा को साकार करेगा। ये संचलन केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज को प्रेरित करने वाले आयोजन हैं।
नागपुर में होगा पहली बार तीन पथ संचलन
दशहरे पर संघ के शताब्दी स्थापना समारोह पर नागपुर में होने वाले मुख्य आयोजन में पहली बार तीन पथ संचलन (स्वयंसेवकों की परेड) आयोजित की जाएगी। जिसमे पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मुख्य अतिथि होंगे तथा समारोह में सरसंघचालक मोहन भागवत का उद्बोधन होगा।
व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक शाखा
शाखा में शारीरिक व्यायाम और खेलों के साथ-साथ टीमवर्क और नेतृत्व कौशल सुधारने के लिए गतिविधियां होती हैं और यहा शरीर को स्वस्थ रखने से लेकर ‘आत्मरक्षा’ की तकनीक तक सिखाई जाती है। शाखा में ही संघ के सदस्यों को वैचारिक शिक्षा दी जाती है और शाखा में ही उन्हें हिंदुत्व, हिन्दू राष्ट्रवाद, और आरएसएस के अन्य मूल सिद्धांतों के बारे में सिखाया जाता है। शाखा को वास्तव में व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक के लिए संचालित किया जाता है।
ध्वज प्रणाम से बन सकते है स्वयं सेवक
कोई भी हिंदू पुरुष स्वयंसेवक बन सकता है स्वयंसेवक बनने के लिए कोई शुल्क, पंजीकरण फॉर्म या औपचारिक आवेदन नहीं देना होता है। संघ में जो भी व्यक्ति भगवा ध्वज को प्रणाम कर सुबह या शाम दैनिक शाखा में भाग लेना शुरू करता है, वो संघ का स्वयंसेवक बन जाता है।
आधुनिक संसाधनो से जाने शाखा का परिचय
किसी को उनके आस-पास चल रही शाखा या स्वयंसेवक के बारे में जानकारी नहीं है, तो वो उसकी वेबसाइट पर एक फॉर्म भर सकता है, जिसके बाद संघ में शामिल होने के लिए निकटतम शाखा या स्वयंसेवक के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है। अब आधुनिक संसाधनो से भी शाखा का परिचय जाना जा सकता है।
राष्ट्र सेविका समिति में महिलाएँ
आरएसएस मे 1936 से राष्ट्र सेविका समिति प्रारंभ हुई जिसका उद्देश्य एक ही था, इसलिए महिलाएँ राष्ट्र सेविका समिति में शामिल हो सकती हैं। शताब्दी वर्ष में महिला समन्वय कार्यक्रमों के ज़रिए भारतीय चिंतन और सामाजिक परिवर्तन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
गुरुदक्षिणा से चलता है संघ
संघ एक आत्मनिर्भर संगठन है और संघ के काम के लिए संगठन के बाहर से कोई पैसा नहीं लिया जाता, भले ही वो स्वेच्छा से दिया गया हो। संघ की माने तो वो अपना खर्चा उस गुरुदक्षिणा से पूरा करता है, जो साल में एक बार संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज को गुरु मानकर देते है।
संघ की संगठनात्मक व्यवस्था में पूरे देश में 46 प्रांत
संघ की संगठनात्मक व्यवस्था में पूरे देश में 46 प्रांत, उसके बाद विभाग, ज़िले और फिर खंड हैं। संघ के मुताबिक़, 922 ज़िले, 6,597 खंड और 27,720 मंडल में 83,129 दैनिक शाखाएं हैं। हर मंडल में 12 से 15 गांव शामिल हैं। आरएसएस कई संगठनों का समूह है, इन संगठनों को संघ का अनुषांगिक संगठन कहा जाता है, इस पूरे समूह को संघ परिवार कहा जाता है।
संघ परिवार का कौन कौन है हिस्सा
संघ परिवार में भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, वनवासी कल्याण आश्रम, राष्ट्रीय सिख संगत, हिन्दू युवा वाहिनी, भारतीय किसान संघ और भारतीय मज़दूर संघ जैसे संगठन शामिल हैं।
संघ में अब तक छह सरसंघचालक
संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार संघ के पहले सरसंघचालक थे, जो 1925 से 1940 तक इस पद पर रहे। डॉ हेडगेवार के निधन के बाद साल 1940 में माधव सदाशिवराव गोलवलकर संघ के दूसरे सरसंघचालक बने और 1973 तक इस पद पर रहे। वर्ष 1973 में गोलवलकर के निधन के बाद बालासाहब देवरस सरसंघचालक बने और 1994 तक इस पद पर रहे। साल 1994 में बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से बालासाहब देवरस ने राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। राजेंद्र सिंह साल 2000 तक संघ के सरसंघचालक रहे और साल 2000 में के. एस. सुदर्शन संघ के नए सरसंघचालक बने और 2009 तक इस पद पर बने रहे। साल 2009 में सुदर्शन ने मोहन भागवत को अपना उत्तराधिकारी चुना भागवत संघ के छठे सरसंघचालक हैं।
तीन बार आरएसएस पर लगाए व हटाए गए प्रतिबंध
आरएसएस को सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने वाला संगठन मानते हुए सरकार ने उस पर फरवरी 1948 में प्रतिबंध लगा दिया और संघ सरसंघचालक गोलवलकर को गिरफ़्तार कर लिया गया। इसी के साथ साल 1948 में लगाया गया प्रतिबंध हटा लिया गया। जबकि आरएसएस पर दूसरी बार प्रतिबंध साल 1975 में लगाया जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा की जिसमें प्रतिबंध साल 1977 में आपातकाल के ख़त्म होने के साथ ही हट गया। साल 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद आरएसएस पर तीसरी बार प्रतिबंध लगाया गया लेकिन जून 1993 में बाहरी आयोग ने इस प्रतिबंध को अनुचित माना और सरकार को उसे हटाना पड़ा।
सरकारी कर्मचारियों पर गृह मंत्रालय का प्रतिबंध
वर्ष 1966 में भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी राजनीतिक दल या किसी ऐसे संगठन का सदस्य नहीं हो सकता जो राजनीति में हिस्सा लेता हो। इसके साथ ही सरकारी कर्मचारियों के राजनीतिक आंदोलन या गतिविधि में भाग लेने, मदद के लिए चंदा देने या किसी अन्य तरीक़े से मदद करने पर रोक लगाई गई थी। जिसमें कोई सरकारी कर्मचारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी का सदस्य है या उनसे जुड़ा हुआ है तो सिविल सर्विस आचरण नियमों के तहत अनुशासनात्मक का प्रावधान था।
आरएसएस से जुड़ सकते है सरकारी कर्मचारियों
जुलाई 2024 में केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ़ पर्सोनेल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) ने एक सर्कुलर जारी करके कहा कि साल 1966, 1970 और 1980 में दिए गए निर्देशों की समीक्षा के बाद उन आदेशों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम हटाने का फ़ैसला किया गया है। किसी भी सरकारी कर्मचारी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने या उसके लिए काम करने पर अब कोई मनाही नहीं है।
देश की आत्मा हमारी साझा संस्कृति
संघ के शताब्दी वर्ष में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में व्याख्यानमाला दी जहा उनके शब्द जन जन तक पहुचे। उन्होंने कहा, ‘भारत मुसलमानों के बिना अधूरा है। इस देश की आत्मा हमारी साझा संस्कृति है, किसी एक मज़हब की नहीं। यह बदलाव का प्रतीक माना जा रहा है जिसमें संघ ने अपनी शताब्दी यात्रा का कदम बढ़ा दिया है।
हिन्दु एकता से समाजिक एकता तक संघ
सौ वर्ष की यात्रा मे संघ की उपलब्धियो की चर्चा जब होती है तब उनके हिन्दु एकता से समाजिक एकता तक के सफर पर चर्चा जरूरी हो जाती है। जैसा की सभी जानते है कि 1925 में डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार ने संघ की नींव रखी थी। शुरुआती दशकों में इसका फोकस हिंदू समाज को संगठित करने पर रहा। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि भारत की ताकत केवल हिंदुओं में नहीं, बल्कि पूरे समाज की सम्पूर्ण एकता में है। संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने सामाजिक एकता को केन्द्रित करते हुए कहा कि संवाद से ही हर मुश्किल का हल होगा। वर्ष 2022 में उनकी मुलाकात ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी से हुई। इस मुलाकात में इलियासी ने भागवत को ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया। अजमेर दरगाह के सज्जादानशीन सैयद सलमान चिश्ती से संवाद ने धार्मिक नेताओं को भी जोड़ने का रास्ता खोला। भागवत का बयान, ‘हिंदू और मुसलमान का पूर्वज एक है’, कई बार चर्चा का केंद्र बना है। दिल्ली में भागवत ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार सैफुद्दीन शेख और मुस्लिम बुद्धिजीवियों से बातचीत की। जिसके बाद कुरैशी ने कहा था, ‘हमने संघ प्रमुख से खुलकर बातचीत की। कई मुद्दों पर हमारी असहमति रही, लेकिन बातचीत से यह साफ हुआ कि हमें एक-दूसरे की सोच को समझने का मौका मिलना चाहिए।
बाला साहब देवरस ने दिया मुस्लिम एकता का सूत्र
पूर्व सरसंघचालक बाला साहब देवरस (तीसरे सरसंघचालक) ने 1975-77 के आपातकाल के बाद मुसलमानों से संवाद की पहल की थी और कहा था कि भारत की आजादी और एकता सभी धर्मों के सहयोग से ही संभव है। इसके साथ ही के.एस. सुदर्शन (पांचवें सरसंघचालक) ने अपने कार्यकाल में मुस्लिम बुद्धिजीवियों को संगोष्ठियों में बुलाने की परंपरा शुरू की। यहां तक कि गुरुजी गोलवलकर भी विभाजन के बाद मुस्लिम समाज की सुरक्षा को लेकर कई मौकों पर चिंता जताते थे।
मुस्लिम समाज की मदद में बढते सघं के कदम
संघ की परिकल्पना करने लोग जो संघ की समरसता को नही जानते वह भ्रातीं फैलाते रहते है लेकिन संघ ने समय समय पर अपनी निष्पक्षता को समाज तक पहुचाया है। गौरतलब है कि संघ की छवि अक्सर केवल वैचारिक संगठन की बनी रही, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके स्वयंसेवकों ने कई बार मुस्लिम समाज की सहायता की है। जिसमे सेवा धर्म को सबसे ऊपर बताते हुए उसे चरितार्थ किया है।
सूत्रो की माने तो गुजरात भूकंप (2001): भुज और कच्छ के मुस्लिम बहुल इलाकों में राहत कार्यों के दौरान संघ स्वयंसेवकों ने मस्जिदों में भी राहत कैंप लगाए। इसके साथ ही कोविड महामारी (2020-21): उत्तर प्रदेश और दिल्ली के कई मुस्लिम मोहल्लों में संघ के कार्यकर्ताओं ने दवा और राशन पहुँचाया। दिल्ली की जामा मस्जिद क्षेत्र में लगाए गए शिविर में मुस्लिम परिवारों ने खुले दिल से स्वयंसेवकों का स्वागत किया। बिहार और असम में बाढ़ राहत के दौरान मुस्लिम बस्तियों में राहत सामग्री पहुंचाने के उदाहरण बार-बार सामने आए हैं।
हिन्दु ही नही मुस्लिम समाज को भी जोड़ने का लक्ष्य
विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यान माला में मोहन भागवत ने हिंदू-मुस्लिम को साथ रहकर चलने का संदेश दिया। उनका कहना है कि आपसी मतभेद को मिटाना होगा। इस दौरान उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कही, ‘हमारी ताकत विविधता है। अगर हिंदू और मुसलमान मिलकर आगे बढ़ें, तो भारत को कोई ताकत रोक नहीं सकती।’ जिसे संघ के भविष्य का रोडमैप भी बताया जा रहा है। आज जब संघ अपनी शताब्दी यात्रा में है, तो उसके सामने सबसे बड़ा लक्ष्य केवल शाखाएं बढ़ाना या संगठन का विस्तार करना नहीं, बल्कि समाज को जोड़ना है। मुस्लिम समाज से संवाद इसी दिशा में सबसे अहम पहल साबित हो रहा है।
विजयादशमी उत्सव
02 अक्टूबर से शत-प्रतिशत स्वयं सेवकों का गणवेश में एकत्रीकरण । जिला केंद्र की सभी बस्ती तथा अन्य नगरों में नगर एकत्रीकरण सभी मंडलों में मंडल एकत्रीकरण। शाखाओं में नई भर्ती एवं वृहत्तम गणवेश निर्माण अभियान ।
गृह सम्पर्क अभियान
01 से 20 दिसम्बर 2025
शत-प्रतिशत घरों में स्वयंसेवकों द्वारा संपर्क | बस्ती / मंडल टोली बनेगी जिसमें 5-7 सदस्य होंगे तथा इनमें भी प्रमुख एवं सह प्रमुख होंगे। जो साहित्य वितरण व विभिन्न बैठकों की रचना व्यवस्था करेगी।
मोहल्ला / ग्राम स्तर पर संपर्क टोली बनाना। बड़े ग्राम में दो-तीन टोलियाँ हो सकती है। प्रत्येक 50-60 घरों पर एक संपर्क टोली की रचना करना है । एक संपर्क टोली में 4 सदस्य रहेंगे इनमें से 1-2 मातृशक्ति हो सकती है।
हिन्दू सम्मेलन
15 से 30 जनवरी 2026 तक सभी मंडल/ बस्ती केंद्रों पर समाज द्वारा आयोजन। ( सर्वव्यापी सर्वस्पर्शी सहभागिता । जिले व खंड की 5 से 10 लोगों की संचालन टोली बनाना है।
आयोजित होगीं सद्भाव बैठकें
01 से 15 अप्रैल तक जाति बिरादरी से ऊपर उठकर समाज हिन्दू व देश का सोचने वाला बने। देश भक्ति का भाव जगे। किसी जाति की समस्या हमारी सामूहिक समस्या है यह भाव हो। समाज परस्पर सहयोगी बने। सामाजिक नेतृत्व विकसित हो । समाज की कमियां दूर होकर सक्षम बने । स्थानीय समस्याओं का समाधान करने में समाज सक्षम हो । यह बैठकें नगर/खंड स्तर पर जिले/खंड की • जागरण टोली द्वारा आयोजित होंगी।
प्रमुख जन गोष्ठी
15 अप्रैल से 30 मई 2026 सभी जिला केंद्र एवं चयनित स्थानों में कुल 100 कार्यक्रम| देश भर में समाज के प्रभावी बन्धु-भगिनियों के साथ संवाद। समाज की प्रभावी सज्जन शक्ति को चिन्हित कर सूचीबद्ध करना। ऐसे सभी बन्धु-भगिनियों के साथ महत्वपूर्ण सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर संवाद करना। समाज परिवर्तन के प्रयोगों की गति बढ़ाने हेतु सभी समाज बन्धु-भगिनियां प्रयत्नशील हों।
इन गोष्ठियों में समाज के प्रमुख व्यक्तियों को सूचीबद्ध कर निमंत्रित करना है । गोष्ठियों में 100 से 200 संख्या तक ही रखना अच्छा रहेगा। (सूची लगभग 300-400 की बनानी चाहिए)। प्रत्येक जिला केंद्र पर प्रमुख जन गोष्ठी होना अपेक्षित है। “अधिकतम स्थानों पर 7 दिन शाखा 20 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 प्रत्येक ग्राम एवं मोहल्लों में सात दिवसीय विस्तारक की उपस्थिति में शाखा लगेंगे। प्रत्येक ग्राम एवं मोहल्ले में संघ की उपस्थिति सुनिश्चित करना । संघ कार्य का विस्तार घर-घर तक । समाज परिवर्तन में प्रत्येक हिन्दू परिवार की सहभागिता सुनिश्चित करना । प्रत्येक ग्राम मोहल्ले में जागरण टोली की स्थायी
स्थापना वर्ष का संकल्प
संघ के द्वारा प्रत्येक कार्यकर्ता शाखा लगाने वाला बने ऐसी योजना। युवा कार्य विजयादशमी उत्सव 02 से 15 अक्टूबर 2025 तक किया जाएगा। युवा सम्पर्क अभियान (भगवान बिरसामुण्डा जयंती से संविधान दिवस 15 से 26 नवम्बर 2025 ) । गणवेश में अधिकतम उपस्थिति योजना 28 सितम्बर 2025
युवा सम्मेलन 11, 12 जन. 2026 जिला केन्द्र पर किया जाएगा साथ ही शारीरिक कार्यक्रम 27 फरवरी से 01 मार्च 2026 तक किए जाने की योजना निर्धारित है।